जनता खाद की लाइन में बेहाल हो रही….

लक्की राठौड़ झाबुआ✍️

आदिवासी अंचल में खाद के लिए किसानों की लंबी कतारें, घंटों इंतजार और बढ़ती बेचैनी अब सिर्फ खाद की किल्लत का मामला नहीं रह गया है। यह सवाल प्रशासनिक व्यवस्था और जवाबदेही तक पहुंच गया है। किसान खेत बचाने के लिए लाइन में खड़ा है,लेकिन सवाल यह है कि जिन अधिकारियों के कंधों पर व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी है, वे आखिर ग्राउंड जीरो पर कितने सक्रिय हैं?

एक तरफ खाद के लिए किसानों का जनसैलाब उमड़ रहा है, दूसरी तरफ जिम्मेदार अधिकारियों की मौजूदगी और कार्यशैली को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी सामने आई है कि जब किसान परेशान थे, लंबी लाइने थी भीड़ भाड़ में लोग परेशान थे तब तहसील के अधिकारी कार्यालय में ही व्यस्त नजर आए। यहां तक कि मोबाइल पर गेम खेलने जैसे आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना बाकी है।

किसान लाइन में, साहब कहां?

खाद की कतार में खड़ा किसान कोई मौज-मस्ती के लिए नहीं आया है। उसके पीछे खेत है, फसल है, कर्ज है और परिवार की उम्मीद है। घंटों लाइन में खड़े रहने के बावजूद यदि उसे यह भरोसा न हो कि खाद समय पर मिलेगी, तो उसकी परेशानी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

ऐसे हालात में सवाल बेहद सीधा है—

क्या जिम्मेदार अधिकारी की पहली प्राथमिकता कार्यालय की चारदीवारी होनी चाहिए या फिर जनता के बीच पहुंचकर व्यवस्था को अपनी आंखों से देखना?

सरकार अधिकारियों को जनता की सेवा और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए जिम्मेदारी देती है। इसलिए जब खाद जैसी आवश्यक वस्तु को लेकर बड़ी संख्या में किसान परेशान हों, तब मौके पर पहुंचकर व्यवस्था देखना और किसानों की समस्या सुनना प्रशासनिक जिम्मेदारी का अहम हिस्सा माना जाता है।

सम्मान लेने में आगे, जिम्मेदारी निभाने में भी आगे आइए साहब!

सरकारी कार्यक्रमों में सम्मान मिलना अच्छी बात है। लेकिन अधिकारी की असली परीक्षा तब होती है, जब जनता संकट में हो।सम्मान मंच पर मिलता है, लेकिन भरोसा मैदान में बनता है।
किसानों की भीड़ के बीच खड़े होकर उनकी समस्या सुनना, वितरण व्यवस्था देखना और जरूरत पड़ने पर तत्काल निर्णय लेना—यही प्रशासनिक सक्रियता की असली तस्वीर है।

डिप्टी कलेक्टर पहुंचे ग्राउंड जीरो, व्यवस्था का लिया जायजा

इसी बीच डिप्टी कलेक्टर सुनील डावर मंगलवार को मारफेड झाबुआ के खाद-बीज गोदाम पहुंचे और मौके पर व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया। गोदाम पर किसानों की भीड़ मौजूद थी, लेकिन जानकारी के अनुसार खाद वितरण शांतिपूर्वक चल रहा था।

गोदाम प्रभारी के अनुसार तत्काल मांग के अनुरूप करीब 25 टन यूरिया उपलब्ध था, जिसका उठाव कुछ घंटों में होने की बात कही गई। वहीं अगले दिन इफ्को से करीब 300 टन यूरिया आने की जानकारी भी दी गई।
डिप्टी कलेक्टर का मौके पर पहुंचना यह संदेश देता है कि वरिष्ठ अधिकारी जब जरूरत पड़ने पर ग्राउंड जीरो पर उतर सकते हैं, तो तहसील स्तर पर जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों से भी जनता स्वाभाविक रूप से यही उम्मीद करेगी।

अतिक्रमण की शिकायत पर भी मौके पर कार्रवाई

इसी दौरान ग्राम तिकड़ीमोती में शासकीय सर्वे नंबर 666, रकबा 0.11 पर अतिक्रमण की शिकायत के मामले में भी कार्रवाई की गई। शिकायतकर्ता पार सिंह पिता बच्चू निनामा की सीएम हेल्पलाइन शिकायत के बाद मौके पर कार्रवाई करते हुए कथित अतिक्रमण हटवाया गया।

जानकारी के अनुसार खेत में खड़ी फसल को ट्रैक्टर से नुकसान पहुंचने की बात भी सामने आई और जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराया गया।

यह कार्रवाई भी प्रशासनिक तंत्र के लिए एक स्पष्ट संदेश है—शिकायत कागज पर दर्ज होने के बाद फाइल घूमती रहे, इससे जनता को राहत नहीं मिलती। राहत तब मिलती है जब अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं और कार्रवाई होती है।

अब सवाल तहसीलदारी पर भी!

डिप्टी कलेक्टर का लगातार मौके पर पहुंचना अब चर्चा का विषय बन गया है। सवाल उठ रहा है कि जब जिला प्रशासन के अधिकारी खुद खाद वितरण केंद्रों और शिकायतों की स्थिति देखने मैदान में पहुंच रहे हैं, तो तहसील स्तर की सीधी जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी कितने सक्रिय हैं?

क्या किसानों की परेशानी की जानकारी केवल रिपोर्ट और फोन के जरिए ली जाएगी?
क्या खाद वितरण केंद्रों की भीड़ का जायजा कार्यालय में बैठकर ही पूरा हो जाएगा?
या फिर अधिकारी खुद मौके पर पहुंचकर किसानों से संवाद करेंगे?

जनता को भाषण नहीं, व्यवस्था चाहिए

किसान को बड़े-बड़े आश्वासन नहीं चाहिए। उसे समय पर खाद चाहिए। उसे लाइन में घंटों खड़े होने से राहत चाहिए। उसे व्यवस्थित वितरण चाहिए। उसे यह भरोसा चाहिए कि प्रशासन उसकी परेशानी को गंभीरता से ले रहा है।

सवाल किसी एक अधिकारी को कटघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का है।

अगर वरिष्ठ अधिकारी मैदान में उतरकर व्यवस्था देख सकते हैं, तो स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी भी उसी तत्परता से मैदान में क्यों नहीं दिखने चाहिए?

अब देखना यह होगा कि खाद संकट के बीच प्रशासन की सक्रियता सिर्फ आदेश, निरीक्षण और कागजी रिपोर्टों तक सीमित रहती है या फिर जिम्मेदार अधिकारी वास्तव में किसानों के बीच पहुंचकर उनकी परेशानी को अपनी जिम्मेदारी मानते हैं।

क्योंकि साहब—किसान की लाइन में खड़ा हर व्यक्ति सिर्फ खाद नहीं मांग रहा, वह अपने खेत, अपनी फसल और अपने परिवार का भविष्य बचाने के लिए खड़ा है। और जब जनता लाइन में हो, तब अधिकारी की कुर्सी से ज्यादा जरूरी उसका मैदान में होना है।